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आयुर्वेद केवल चिकित्सा नहीं, प्रकृति के साथ संतुलित जीवन की पद्धति : स्वामी चिदानन्द

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परमार्थ निकेतन में विभिन्न देशों से आए योग-जिज्ञासुओं ने प्राप्त किया योग, वेदांत और आयुर्वेद का प्रशिक्षण

(उत्तर केसरी संवाददाता)
ऋषिकेश, 23 सितंबर। परमार्थ निकेतन में विश्व के विभिन्न देशों से आए योग-जिज्ञासु भारतीय ऋषि परंपरा के ज्ञान से गहराई से जुड़ रहे हैं। यहां योग, वेदांत और आयुर्वेद का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे साधकों ने परमार्थ निकेतन के पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज और डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती जी से भेंट की। इस दौरान साधकों ने योग, आयुर्वेद, भारतीय जीवन-पद्धति और आध्यात्मिक साधना से जुड़ी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया। आयुर्वेद को दैनिक जीवन में अपनाने के तरीकों पर भी विशेष चर्चा हुई।

आयुर्वेद दिवस के अवसर पर आयोजित विशेष संवाद में भारतीय ज्ञान परंपरा की उस समग्र जीवन-दृष्टि पर विचार किया गया, जिसमें शरीर, मन, बुद्धि, आत्मा और प्रकृति को स्वस्थ जीवन के अभिन्न अंग माना गया है। इस अवसर पर योग-जिज्ञासुओं को आयुर्वेद के माध्यम से स्वस्थ जीवन के साथ संयमित एवं संतुलित जीवन-पद्धति अपनाने के लिए प्रेरित किया गया।

प्रकृति के साथ सामंजस्य से आता है स्वास्थ्य और संतुलन

पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि आयुर्वेद केवल रोगों के उपचार का विज्ञान नहीं, बल्कि स्वस्थ, संतुलित, सात्त्विक और प्रकृति के अनुरूप जीवन जीने की भारतीय पद्धति है। भारतीय ऋषि परंपरा ने हजारों वर्ष पहले ही यह समझ लिया था कि मनुष्य प्रकृति से अलग नहीं, बल्कि उसका अभिन्न अंग है। जब मनुष्य का जीवन प्रकृति की लय के अनुरूप चलता है तो स्वास्थ्य, शांति और संतुलन सहज रूप से जीवन में आते हैं।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में पूरा विश्व तनाव, असंतुलित जीवनशैली और प्रकृति से बढ़ती दूरी जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे समय में भारत की योग, आयुर्वेद और वेदांत आधारित समग्र जीवन-दृष्टि का महत्व और बढ़ जाता है। योग व्यक्ति को स्वयं से जोड़ता है, आयुर्वेद प्रकृति से जोड़ता है और वेदांत मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराता है।

आहार, दिनचर्या और विचार भी आयुर्वेद का हिस्सा

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि ‘आयुः’ का अर्थ जीवन और ‘वेद’ का अर्थ ज्ञान है। इस दृष्टि से आयुर्वेद जीवन को जानने, समझने और सार्थक बनाने का विज्ञान है। यह केवल औषधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि आहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या, विचार, व्यवहार और जीवन में समग्र संतुलन का मार्गदर्शन करता है।

उन्होंने योग-जिज्ञासुओं का आह्वान किया कि वे योग और आयुर्वेद को केवल पाठ्यक्रम अथवा अभ्यास के रूप में न देखें, बल्कि इसे जीवन की संस्कृति बनाएं। योग केवल योगासन तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन में संतुलन, संयम और सजगता विकसित करने की साधना है। इसी प्रकार आयुर्वेद केवल औषधि का ज्ञान नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन के लिए संपूर्ण दृष्टिकोण प्रदान करता है।

भारतीय जीवन-पद्धति को अनुभव कर रहे विदेशी साधक

डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती जी ने विभिन्न देशों से आए साधकों से संवाद करते हुए भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में योग और आयुर्वेद के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत की विशेषता ऐसी जीवन-दृष्टि में है, जिसमें बाहरी स्वास्थ्य के साथ आंतरिक शांति और चेतना के विकास को भी महत्व दिया गया है।

विभिन्न देशों से आए योग-जिज्ञासुओं ने परमार्थ निकेतन में प्राप्त हो रहे प्रशिक्षण और भारतीय संस्कृति के साथ अपने जुड़ाव को प्रेरणादायक बताया। उन्होंने कहा कि गंगा तट पर योग, ध्यान, वेदांत और आयुर्वेद का अध्ययन उन्हें केवल ज्ञान ही नहीं दे रहा, बल्कि भारतीय जीवन-पद्धति को निकट से समझने और अनुभव करने का अवसर भी प्रदान कर रहा है।

परमार्थ निकेतन में योग एवं आध्यात्मिक साधना के साथ गंगा आरती, सत्संग, ध्यान और भारतीय संस्कृति के विभिन्न आयामों से भी योग-जिज्ञासु एवं साधक परिचित हो रहे हैं। आयुर्वेद दिवस के अवसर पर उन्होंने प्रकृति के सम्मान, जीवन में संतुलन, आहार में सात्त्विकता और दिनचर्या में अनुशासन अपनाने का संकल्प लिया।

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